कंकाल
भीमसेन का पुत्र वीर विकराल बहुत, जिसकी माला में गूथे कंकाल बहुत। रूप भयावह धरे दनुज रण में उतरे, तंत्र मंत्र भ्रम माया है कमाल बहुत।। खड़ा शिखर के जैसा सुदृढ़ हटे नहीं। क्षुद्र तीर से दैत्य वीर यह मिटे नहीं, रवि रश्मि का भक्षण जिसकी देह करे, है विशाल काया तनिक भी घटे नहीं।। है अभेद दुर्ग सशक्त वीर घटोत्कच, महादेव का प्रिय भक्त वीर घटोत्कच। उमापति के जैसा भट का रण कौशल, है असाध्य पांडव रक्त वीर घटोत्कच।। दुर्योधन स्वयं हार स्वीकार करो, मरण पूर्व मेरा प्रकट आभार करो। करो प्रदर्शित तुममें कितना है छल-बल, छुपो नहीं मृत्यु से साक्षात्कार करो।।
— गुमनाम कवि
भावार्थ
इस कविता में कवि ने भीमसेन के पुत्र घटोत्कच के विकराल और भयंकर रूप का वर्णन किया है। वह रणभूमि में अत्यंत शक्तिशाली और मायावी योद्धा के रूप में प्रस्तुत होता है।
घटोत्कच की शक्ति इतनी प्रचंड है कि वह साधारण अस्त्रों से पराजित नहीं होता। उसका शरीर अत्यंत विशाल और अडिग है, जिसे सूर्य की किरणें भी प्रभावित नहीं कर सकतीं।
उसे महादेव का भक्त और अपार रण-कौशल वाला योद्धा बताया गया है, जो पांडव पक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण वीर है।
अंत में वह दुर्योधन को युद्ध में सामना करने और अपने छल-बल को प्रदर्शित करने की चुनौती देता है।

Leave a Reply