नीलकंठ महादेव

नीलकंठ महादेव


पुष्प से गिरे-गिरे हैं श्वेत हिम बिखर-बिखर, ढक गया है पर्वत मैं देखता जिधर-जिधर। अप्सराएं देवगण करें यहां भ्रमण-भ्रमण, नृत्य कर रहे हैं नीलकंठ हर शिखर-शिखर।। देवता के देव शिव सहज-सहज सरल-सरल, प्रचंड देवता निवास नेत्र में अनल-अनल। खिला रहे हैं धर्मराज को त्रयंबकेश्वर, कंठ कालकूट वासुकी के मुख गरल-गरल।। ढोल बज रहा कैलाश जोरदार ढमक-ढमक, छटक-झटक पैर बज रहे नूपुर खनक-खनक। कर रहा डुडुक-डुडुक है नीलकंठ का डमरु, सिंधु गामिनी कर रही निनाद छलक-छलक।। पुण्य है त्रिनेत्रजा जटाओं से चपल-चपल, डगर खिला-खिला रही है कोमल कमल-कमल। चांदनी की कांति देख आंख खोलते कुमुद, शशांक शीर्ष शीतल सुशोभित धवल-धवल।।

— गुमनाम कवि


भावार्थ

इस कविता में कैलाश पर्वत और भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप का दिव्य और भव्य चित्रण किया गया है। श्वेत हिम से ढके पर्वतों, देव-अप्सराओं के भ्रमण और नीलकंठ शिव के कैलाश में नृत्य का वर्णन किया गया है।

कवि शिव को सहज, सरल और प्रचंड शक्ति का स्वामी बताता है, जिनके नेत्रों में अग्नि का तेज समाया हुआ है। उनके कंठ में हलाहल विष स्थित है जिसे उन्होंने सृष्टि की रक्षा हेतु धारण किया था।

आगे कैलाश का दिव्य वातावरण दिखाया गया है जहाँ ढोल-नगाड़े, नूपुर की ध्वनि और डमरु की गूंज पूरे वातावरण को पवित्र कर देती है।

अंतिम पद में प्रकृति की सुंदरता का वर्णन है—कमल, चांदनी और शीतल आभा के माध्यम से शिव के दिव्य स्वरूप को शांत और सौम्य रूप में दर्शाया गया है।

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