खामोशी
बड़ी मशक्कत के बाद खुद को सँवार कर बैठे हैं, हम अपने इस गम को दरकिनार कर बैठे हैं। महफिलों में नहीं दिखती होठों की थरथराहट, हम अपनी आंखों से आंसू उतार कर बैठे हैं।। हमने उनसे ख्वाहिश करना छोड़ दिया, दिल ने उनसे गुजारिश करना छोड़ दिया। रोना आज भी पहले जितना ही होता है, मगर आंखों ने बारिश करना छोड़ दिया।। नजर मिलाने वाली नजर चुराने लगी है, अब वह मेरी कमियां मुझे बताने लगी है। बौना लगने लगा है उसे फिलहाल मेरा कद, क्योंकि चार पैसे वह अब कमाने लगी है।। वह गैरों की रियासत तुम्हारे किस काम की, रह न सको ऐसी इमारत तुम्हारे किस काम की। पराए पूजने से बेहतर पूजते रब को मोहब्बत को, पा न सको उसकी इबादत तुम्हारे किस काम की।। मुस्कुराकर अपनापन जताना जानते हैं लोग, बहुत अच्छे से जोड़-घटाना जानते हैं लोग। नफा-नुकसान सब देखा जाता है जिंदगी में, मासूमियत का फायदा उठाना जानते हैं लोग।।
— गुमनाम
भावार्थ
इस कविता में कवि अपने भीतर के गहरे दुःख और टूटे हुए प्रेम का चित्रण करता है। वह बताता है कि उसने बहुत संघर्ष के बाद खुद को संभाल लिया है और अपने दर्द को भीतर दबाकर जीना सीख लिया है।
वह कहता है कि अब वह अपने गम को दूसरों के सामने नहीं दिखाता। महफिलों में भी उसके चेहरे पर दर्द दिखाई नहीं देता, क्योंकि उसने अपने आँसू भीतर ही रोक लिए हैं।
कवि यह भी बताता है कि उसने उस व्यक्ति से अब कोई इच्छा या शिकायत करना छोड़ दिया है, जिससे वह कभी जुड़ा था। दर्द अभी भी उतना ही है, लेकिन अब वह बाहर नहीं आता, आँसू भी रुक गए हैं।
आगे वह रिश्तों में आए बदलाव को दिखाता है—जो व्यक्ति कभी पास था, वही अब दूर हो गया है और उसकी नजरें बदल गई हैं। अब वह उसकी कमियों को देखने लगा है और पैसों के कारण खुद को बेहतर समझने लगा है।
अंतिम भाग में कवि दुनिया के स्वार्थ को उजागर करता है। वह कहता है कि लोग मासूमियत का फायदा उठाना जानते हैं और रिश्तों को भी नफा-नुकसान की तरह देखने लगे हैं। सच्चा अपनापन अब कम होता जा रहा है।

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