भुजंगप्रयात छंद
यह रचना अहिल्या के भावों का संवेदनशील चित्रण है।
भुजंगप्रयात छंद की लय इसे स्मरणीय बनाती है।
भुजंगप्रयात छंद:
यगण यगण यगण यगण
ISS ISS ISS ISS
यगण यगण यगण यगण
ISS ISS ISS ISS
यही एक है याचना भक्तिनी की,
सुनो देव! है प्रार्थना भक्तिनी की।
करो मुक्त पाषाण के श्राप से हां,
यही सिर्फ है कामना भक्तिनी की।।
चले राम आओ बनी हूं शिला मैं।
कई वर्ष बीते खड़ी हूं यहां मैं।
जरा देख लो टीस है चित्त में क्या
मुझे है रुलाती बताऊं कहां मैं।।
बहे आंख से लाख आंसू हमारे,
लगादो कि नैय्या हमारी किनारे।
कहीं हो न जाए कही बात मिथ्या,
कि नैना बिछाए हुए है अहिल्या।।
पधारे हमारे कुटी में तपस्वी,
लगे दूर से तीन लोग मनस्वी।
न जूती न है शीश में मौर जेबा,
मुझे है लगे वीर हैं ये यशस्वी।।
लगे देखने पांव को नैन मेरे,
लगे देखने घाव को नैन मेरे।
चुभे पैर कांटे, बहे रक्त लाली,
लगे देखने भाव को नैन मेरे।।
पुकारे मुझे मां कहे नाम मेरा,
बड़ी दूर से आ रहे धाम मेरा।
कि आभास होने लगा है मुझे ये,
चले आ रहे पास में राम मेरे।।
— गुमनाम कवि
